Essay On Bhartiya Shiksha In Hindi

दिनांक:-02/05/2010 प्रथम सत्र वार-रविवार

विषय:- शिक्षा की वर्तमान स्थिति, परिवर्तन की दिशा व उसमें हमारी भूमिका

मुख्य वक्ता:- श्री अतुल जी कोठारी

 

कोठारी जी ने ॐकार की ध्वनि से उद्बोधन का प्रारम्भ किया। आनन्द का विषय है कि यह संस्था 47 वर्षों से शिक्षा जगत में कार्य कर रही है। यहाँ विगत 18 वर्षों से अभ्यास वर्ग संचालित हो रहे है। मुझे इसमें सम्मिलित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कार्यक्रम की शुरूआत में जिस मंत्र का उच्चारण किया गया उसका भाव है-असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमरत्व की ओर जाना ही शिक्षा का उद्देश्य है। लेकिन देश की शिक्षा के वर्तमान परिदृश्य के बारे में एक कवि ने अपनी चार पंक्तियों में वर्णन किया है।

 

‘‘चलो जलाएं दीप वहां, जहाँ अभी भी अंधेरा है।,

शिक्षा पाकर भिक्षा मांगे, युवजन खाए ठोकर आज।

आजादी का स्वप्न दिखाकर, पाखंडी करते हैं राज।।

भ्रष्ट व्यवस्था ने भी डाला, अब यहाँ डेरा है।

चलो जलाएं दीप वहां जहां अभी भी अंधेरा है।”

 

हम सभी शिक्षा के वास्तविक लक्ष्य व शिक्षा की वर्तमान स्थिति की खाई को पाटने में लगे हैं। हम सभी पढ़ाते हैं। श्याम पट साफ स्वच्छ है तब नई बात उस पर लिखना आसान होता है लेकिन जब गलत बातें बोर्ड पर लिखी हुई है तब उसको पहले हटाना पड़ता हैं। बाद में इस पर अच्छी बातें लिखते है। पिछले साढ़े पांच वर्षों से गलत बातें पाठ्यक्रमों से हटाने का कार्य शिक्षा बचाओ आन्दोलन समिति के माध्यम से किया जा रहा है तथा अच्छी बातें लिखने का कार्य शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के द्वारा शुरु किया गया है। देश की शिक्षा में भी यही आवश्यक हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली में भी ऐसी विसंगतियाँ, विकृतियाँ डाली गई हैं। जो विधर्मी, विदेशी भी नहीं डाल सकते, लेकिन हमारे देश के ही एक निश्चित विचारधारा के लोग ऐसा कर रहे हैं।

 

स्वतंत्रता के 60 वर्षो के बाद भी यह बातें चल रही हैं।

अंग्रेजों ने हमें पढ़ाया कि

आर्य विदेश से आए और द्रविड़ो को उन्होंने खदेड़ा।

अंग्रेजों ने यह इसलिए पढ़ाया की

आर्य (हम) भी भारत में आक्रमणकारी बनकर आए थे तो फिर हमें अंग्रेजों को विदेशी एवं आक्रामक कहने का क्या अधिकार है।

 

लेकिन आज भी यही पढ़ाया जा रहा है। लोकमान्य तिलक जैसे महापुरुष के नाम पर यह संस्था है

ऐसे सभी क्रांतिकारियों –

लाल, बाल, पाल आदि को एनसीईआरटी (NCERT) की पुस्तकों में आतंकवादी पढ़ाया जा रहा था।

देश में शिक्षा बचाओ आन्दोलन समिति के द्वारा इसके विरूद्ध संघर्ष छेड़ा गया। इसके परिणाम स्वरूप लाखों विद्यार्थियों को इन विकृत सामग्री पढ़ने से मुक्ति मिली। एनसीईआरटी की इतिहास की पुस्तकों में से 75 अंश निकाले गये। यह सारे अंश हमारी संस्कृति, धर्म, महापुरुषों को अपमानित करने वाले थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के बी.ए. (आर्नस) द्वितीय वर्ष के पाठ्यक्रम में रामायण के पात्रों के बारे में विकृत बातें पढ़ाई जा रही हैं। यह सभी बातें राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के षड्यंत्र के तहत किया जा रहा है। भारत की संस्कृति, धर्म, परम्पराएं श्रेष्ठ हैं। पश्चिम की एक लॉबी व भारत की एक विचार धारा के लोगों को यह सहन नहीं होता। यदि रामायण के पात्रों को विकृत रूप में पढ़ाएंगे तो देश के विद्यार्थी उनका सम्मान कैसे करेंगे? लगभग विगत 150 वर्षों से ऐसा ही पढ़ाया जा रहा है।

यदि आज हमारे विद्यार्थियों को अगर पूछा जाये!

कि भारत का प्रथम तथा अंतिम अंग्रेज वायसराय कौन था? प्रथम व अंतिम मुगल शासक कौन था?

आदि प्रश्नों के उत्तर वह सही बता सकते है लेकिन

  • वे 4 वेदों के नाम नहीं बता पाते।
  • जैन धर्म मानने वाले बालकों को उनके 24 तीर्थंकरों के नाम बोलने को कहा जाए तो वह उत्तर नहीं दे सकते है।

 

क्योंकि यह सारी बाते पाठ्य पुस्तकों में नहीं है। यह भारतीय स्वाभिमान को समाप्त करने का षड़यन्त्र हैं। जब बालकों के मन में यह आ जाएगा कि हमारे देशवासी, असंस्कारी, अशिक्षित थे। हमारे देवी-देवताएँ भी ऐसे ही थे तो देश के बारे में वह गर्व कैसे करेंगे। अपने यहाँ यदि वैदिक गणित की बात की जाए तो साम्प्रदायिकता के नाम पर बदनाम किया जाता है।लेकिन जब अपने यहां से ये पुस्तकें विदेश पहुँची और एक विदेशी ने भारत में इनका प्रस्तुतीकरण किया तब अपने देश में इस पर अधिक कार्य शुरू हुआ। अपने यहां साधारण धारणा है कि पश्चिम का जो भी है वह श्रेष्ठ है।

 

डॉ. कलाम जी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि उनके घर में एक कलैण्डर लगा था। यह जर्मनी में छपा था। सभी देखने वाले जर्मनी की प्रशंसा करते हुए कहते थे कि चित्र बहुत ही सुन्दर है। कलाम साहब कहते थे कि नीचे छोटे अक्षरों में लिखा है, यह भी पढ़ो। वह पढ़ने पर लोग कहते है कि क्या यह भारतीय के द्वारा लिए गए चित्र है? इसी प्रकार आज अपने देश में अंग्रेजी में बोलने वाले को विद्वान माना जाता है। अपनी भाषा में बोलने वाले को हेय दृष्टि से देखा जाता है।

 

अपने पालक को माता-पिता कहने पर पुरानी विचारधारा का माना जाता है। मम्मी-पापा कहने पर आधुनिक माना जाता है। मॉम-डेड कहने पर और आधुनिक माना जाता है। आज वैदिक गणित को दुनिया स्वीकार कर रही है। बच्चों को वैदिक गणित की विधि से पढ़ाया जाए तो उनको गणित बोझ नहीं लगेगा और वे प्रसन्नता से गणित के प्रश्नों को हल करेंगे। जर्मनी, इंग्लैण्ड आदि देशों में इस विषय पर अधिक कार्य हो रहा है। अपने यहां के कुछ विद्वान कहते हैं- इसका नाम वैदिक गणित क्यों रखा है?हमारे देश में प्रत्येक बात विवाद से प्रारम्भ होती है। हम विवाद करते रहे, अमेरिका के एक सज्जन ने तो वैदिक गणित की एक विद्या पर पेटेन्ट के लिए आवेदन कर दिया है। इसलिए बोर्ड पर गलत बाते लिखी है उसको मात्र हटाने से नही चलेगा। उस पर अच्छी बाते लिखने हेतु हमें इस दिशा में ठोस कार्य करना होगा। केवल भारतीय शिक्षा बालेने पर शिक्षा भारतीय नहीं होगी। हमारे यहां शिक्षा के मूलभूत सिद्वांत तो शावत सत्य है। लेकिन आधुनिक आवश्यकता के अनुसार एक नई व्यवस्था देनी होगी। एक प्रकार से प्राचीन एवं आधुनिकता का समन्वय करना होगा। प्रत्येक विषय के सन्दर्भ में इस प्रकार कार्य करने से जो स्वरूप बनेगा। भारतीय शिक्षा के इस आधुनिक स्वरूप को दुनिया स्वीकार करेगी। इस तरह के प्रयास हेतु शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के द्वारा हमने विभिन्न संस्थाओं से जुड़कर के वैदिक गणित पर छः परिसंवाद आयोजित किये। इसमें से एक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में विपरित परिस्थिति में आयोजित हुआ, लेकिन समापन पर एक प्राध्यापक ने धन्यवाद देते हुए चार दिन की कार्यशाला करने का अनुरोध किया। संकाय अध्यक्ष ने इसे पाठ्यक्रम में शामिल करने का विषय रखा। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के द्वारा इस कार्य को आगे बढ़ाने हेतु भोपाल में वैदिक गणित शोध संस्थान स्थापित करने की योजना है। जिसमें समग्रता से कक्षा 1 से 12 वीं तक का पाठ्यक्रम तैयार करना। इसे उच्च शिक्षा में सम्मिलित करने का प्रयास, प्रतियोगी परिक्षा में उपयोग तथा संगणक एवं वैदिक गणित पर कार्य होगा। इसी प्रकार कार्य करने से न सिर्फ देश में समग्र विश्व में हमारी बातें स्वीकार होगी।

 

देश में 2 वर्ष पूर्व यौन शिक्षा थोपने का प्रयास केन्द्र सरकार के द्वारा किया गया। यह देश की संस्कृति के प्रति भयानक षडयंत्र थे। अपने द्वारा इसके विरूद्ध देशव्यापी आन्दोलन चला। देश की कई संस्थाएं इसमें जुड़ी सबके प्रयास के परिणाम स्वरुप इस पर रोक लगी। इसको लागू करने हेतु तर्क यह दिया गया की देश में एड्स बहुत फैल रहा है। सरकार के पास एड्स के नाम से विदेशों से पैसा आता है। इसका केवल 10 प्रतिशत ही उपयोग होता है। शेष का उपयोग क्या होता है प्रश्न है?। अतः सरकारी अधिकारी इस तरह के कार्यक्रमों के प्रति उत्साहित रहते हैं। यौन शिक्षा पर देशव्यापी चर्चा हो इस हेतु अपने द्वारा राज्यसभा की याचिका समिति (पेटिशन कमेटी) को याचिका दी गई। जिसको स्वीकार करते हुए समिति ने देशभर में सुनवाई की जिसमें उनको 40 हजार से अधिक ज्ञापन प्राप्त हुए। उसमें से 90 प्रतिशत यौन शिक्षा के विरूद्ध थे। समिति ने डेढ़ वर्ष कार्य करके राज्यसभा के सभापति को रिपोर्ट सौपा। उन्होंने हस्ताक्षर करके राज्यसभा में प्रस्तुत भी किया। जिसमें सुझाव था कि यौन शिक्षा के बदले ‘‘चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व विकास’’ की शिक्षा देनी चाहिए। इस हेतु अपने द्वारा दिनांक 21, 22 फरवरी 2009 को पूणे में राष्ट्रीय स्तर का परिसंवाद सम्पन्न हुआ जिसमें सर्वसम्मति से ‘‘चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व के समग्र विकास’’ पाठ्यक्रम के लिए समिति बनाई गई। इस समिति ने चार माह में नया पाठ्यक्रम तैयार किया। पाठ्यक्रम पर देशव्यापी चर्चा होनी चाहिए। पाठ्यक्रम के निर्धारण में छात्रों व शिक्षकों को भी सम्मलित किया जाना चाहिए। इस हेतु देश में इस पाठ्यक्रम पर सात परिसंवाद आयोजित किए गए। जिसमें 1200 से अधिक लोग सहभागी हुए। इनमें से आए सुझावों पर विचार हेतु पुनः पाठ्यक्रम समिति की बैठक हुई। योग्य सुझावो को सम्मलित करते हुए ‘‘चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व के समग्र विकास’’ हेतु नई पुस्तक ‘‘विद्यालय गतिविधियो का आलय’’ का प्रकाशन हुआ। इसके क्रियान्वयन हेतु दिनांक 16 से 18 अप्रैल 2010 को 20 राज्यो के चुने हुए 50 विद्यालयों के प्रधानाचार्यो की कार्यशाला आयोजित की गई। नये सत्र से उन विद्यालयों में इसको लागू किया जाएगा। तीन माह पश्चात उन विद्यालयों के माध्यम से वहां के कम से कम दस विद्यालयों को सम्मलित करके कार्यशाला की जायेगी। बाद में वहां इसको लागू करने का प्रयास होगा। एक वर्ष के बाद सरकारी स्तर पर भी पाठ्यक्रम को लागू करने का प्रयास किया जायेगा। इस पाठ्यक्रम की पुस्तकों से चार बातें प्राप्त होगी:-

 

  • छात्रों में संस्कार का निर्माण।
  • छात्रों में अनुशासन अच्छा होगा।
  • छात्रों के परिणाम पर सकारात्मक प्रभाव होगा।
  • पढ़ाने वाले शिक्षक पर भी प्रभाव पड़ेगा।

 

इस प्रकार ठोस कार्य के बिना भारतीय शिक्षा का नारा अधूरा है। इस हेतु प्रत्येक विषय पर गहन अध्ययन करना होगा। देश की शिक्षा में परिवर्तन की चाबी आचार्य है। हम सभी आचार्य है। आज के सन्दर्भ में शिक्षा देने के कार्य को व्यवसाय माना जाने लगा है। यह व्यवसाय नहीं ध्येय (मिशन) है। शिक्षा का कार्य सर्वश्रेष्ठ है। मनुष्य को बदलने की ताकत इसमें है। हमारे में इसका स्वाभिमान होना चाहिए। हमे पूरी निष्ठा से इस कार्य को करना होगा। पूर्ण मनोयोग से कार्य करने वाले शिक्षकों ने दुनिया में परिवर्तन किया है। मुझे एक प्राचार्य ने कहा कि छात्र कक्षा में नहीं आते? मैने प्रतिप्रश्न किया कयो आयेंगे? क्योंकि गत 150 वर्षो से विद्यार्थी वहीं पद्वति के अनुसार 40 मिनट का भाषण सुनाते है और घर जाते है। पढ़ाने की पद्वति में नयापन लाना होगा। प्राचीन काल में हमारे यहां पढ़ाने की 32 प्रकार की प्रद्धतियाँ थी। हमारे यहा विभिन्न प्रकार के प्रयोंगों के द्वारा शिक्षा दी जाती थी। गुजरात में विद्या भारती के द्वारा कुछ विद्यालयों में प्रयोग किए जा रहे है जिसमें छात्र घर से खाली हाथ आते व घर खाली हाथ जाते है। वहां छोटे बच्चों को इतिहास की शिक्षा चित्रों के माध्यम से दी जाती है। पहाड़े तबले म्यूजिक के साथ बोले जाते हैं। नए-नए प्रयोगों से बच्चों को पढ़ने में आनन्द आता है। इस प्रकार पढ़ाने से जो आनन्द शिक्षको को प्राप्त होता है उसका कोई मापन नहीं हैं। शिक्षक छात्र को पढ़ाने के दृष्टिकोण बदले। हर बच्चे पर समान दृष्टि रखें। यदि हमारा मन कहीं ओर है तो पढ़ाने का फायदा नहीं है। शिक्षक सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक है उसे हर दिन सभी छात्रों की मनोदशा समझनी पड़ती है। आचार्य को माँ व बाप दोनो की भूमिका निभानी पड़ती है। एक बार मदनमोहन मालवीय जी से मिलने एक छात्र आया। वह परीक्षा के शुल्क को देने में असमर्थता बता रहा था। उनके शिक्षकों ने कहा यह गतल बोल रहा है। वह सम्पन्न परिवार का छात्र है, लेकिन वह पैसों का व्यय गलत स्थान पर कर रहा था। मालवीय जी ने कहा:-‘‘यह विद्यार्थी कुछ वर्षो से हमारे यहाँ पढ़ रहा है। फिर भी वह ऐसा व्यवहार करता है उसमें हमारा भी कोई दायित्व है की नही? इसको परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जाए। छात्रों के प्रति यह दृष्टिकोण अत्यंत आवश्यक है। आचार्य बिनोवा भावे के अनुसार- जो अपने आचरण से सिखाए वहीं आचार्य है। एक बार प्रोफेसर यशवन्त राव केलकर ने छात्र को कुछ रुपये दिए। कुछ वर्ष प्रश्चात छात्र ने व्यवसाय प्रारम्भ किया। वह छात्र रुपये लौटाने आया। रुपये वापिस करते हुए प्रोफेसर साहब ने कहा कि वह इसे आप जैसे जरुरतमंद विद्यार्थी के लिये उपयोग करें। अपने व्यवहार से ही विद्यार्थी में परिवर्तन सम्भव है। ऐसी कोई भी धातु नहीं है जो पिधलती नहीं है। उसे जितनी ऊष्मा पिघलने के लिए आवश्यक है वह देनी होगी। देश की समस्याओं का समाधान शिक्षा से ही सम्भव है। विद्यार्थियों को पानी का दुरुपयोग, बिजली का दुरुपयोग रोकने की शिक्षा दें। छोटी-छोटी बातों के माध्यम से बच्चों को व्यवहारिक शिक्षा दी जा सकती है। कक्षा में सामाजिक -राष्ट्रीय दृष्टिकोण देने की भी आवश्यकता है। केवल 40 मिनट का भाषण पर्याप्त नहीं है। कक्षा में सामाजिक परिवर्तन के प्रयोग करना भी आवश्यक है। कक्षा में तीन बार ऊँकार करके कक्षा के अनुशासन में अनुकूल परिवर्तन कर सकते है। छात्रों की एकाग्रता बढ़ा सकते है।

 

शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन बड़ा विषय है। इस हेतु अपने-2 विषय में भारतीय दृष्टिकोण क्या है? इस दिशा में अधिक चिन्तन करना होगा। परिवर्तन के लिए स्वयं से शुरुआत करने की आवश्यकता है। साधारण बातचीत में हम अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करते हैं। भाषा की लड़ाई लम्बी है। लड़ाई की शुरुआत अपने से करनी होगी। हमें अपने हस्ताक्षर मातृभाषा हिन्दी में करने चाहिए। आजकल इण्डिया शब्द अधिक प्रचलित है। नाम का अनुवाद नहीं होता। अंग्रेजी में बोलना या लिखना हमारी मजबूरी हो सकती है। लेकिन अंग्रेजी में भी भारत ही लिखें व बोलें। परिवर्तन छोटी-छोटी बातों से ही होता है।

 

शिक्षा में परिवर्तन यह ईश्वरीय कार्य है। यदि देश का पुनः उत्थान करना है, इसे जगदगुरु बनाना है तो प्रथम शिक्षा में परिवर्तन आवश्यक है। मैकाॅले को मालूम था कि शिक्षा को बदले बिना भारत में शासन करना कठिन है। इसलिए उसने सबसे पहले शिक्षा को बदला, उसकी भाषा को बदला। संस्कृत के स्थान पर अंगे्रजी विद्यालय खोले। उसने अपने पिता को पत्र लिखा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था को बदलने पर उन्हें अत्यन्त खुशी है। लेकिन सही सफलता तब मानी जायेगी कि जब हम यहां नहीं रहेंगे परन्तु शिक्षा व्यवस्था चलती रहेगी। उस शिक्षा प्राप्त, दिखने मै तो भारतीय होंगे लेकिन आचार, व्यवहार, विचार से अभारतीय होगें। वर्तमान में शिक्षा में परिवर्तन यह प्रथम आवश्यकता है। शिक्षक के रूप में हमारा दायित्व इस परिवर्तन के लिए अधिक है। हम शिक्षा में परिवर्तन की दिशा में चिन्तन, विचार करे यही आपसे प्रार्थना।

 

देश की शिक्षा में नये विकल्प हेतु योजना एवं प्रयास|

 

श्री अतुल कोठारी

(सचिव, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास)

सरस्वती बाल मन्दिर, जी ब्लाक नारायणा विहार

नई दिल्ली-110028

सम्पर्क सूत्र:-9212385844, 9868100445

Email : atulabvp@rediffmail.com

Bharat ki nayee Shiksha Neeti par laghu Nibandh

शिक्षा ही किसी समाज और राष्ट्र की जागृति का मूल आधार है। अतः शिक्षा का उदेश्य साक्षरता के साथ साथ जीवनोपयोगिता भी होना चाहिए। शिक्षा-नीति से अभिप्राय शिक्षा में कतिपथ सुधारों से होता है। इसका अधिक सम्बन्ध भावी पीढ़ी से होता है। शिक्षा-नीति के द्वारा हम अपने समय के समाज और राष्ट्र की आश्वयकताओं को पूर्ण रूप से सार्थक सिद्ध करने के लिए कुछ अपेक्षित मानसिक और बौद्धिक जागृति को तैयार करने लगते हैं। नई शिक्षा-नीति का एक विशेष अर्थ है, जो हमारी सोच समझ में हर प्रकार से एक नयापन को ही लाने से तात्पर्य प्रकट करती है।

भारत की स्वतंत्रता के बाद शिक्षा सम्बन्धित यहाँ विविध प्रकार के आयोगों और समितियों का गठन हुआ। इनसे आशातीत सफलता भी मिली। इस सन्दर्भ में महात्मा गाँधी की ‘बुनियादी शिक्षा’ की दृष्टि बहुत अधिक कारगर और अपेक्षापूर्ण सफलता की ओर भी थी। इसी के अन्तर्गत ‘बेसिक विद्यालयों’ की शुरूआत की गई थी। सन् 1953-54 ई. में भारत सरकार ने शिक्षा पद्धति पर गम्भीरतापूर्वक विचार करके आयोग का गठन किया था। इसके अनुसार प्राथमिक शिक्षा चौथी से बढ़ाकर पाँचवीं तक कर दी गयी।

इसी तरह सन् 1964 सन् 1966, सन् 1968 और सन् 1975 में शिक्षा सम्बन्धी आयोग गठित होते रहे। सन् 1986 में 10+2+3 की शिक्षा पद्धति शुरू की गई थी। उसे कुछ राज्यों में भी लागू किया गया।

सन् 1986 में लागू की गई शिक्षा-नीति की घोषणा करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इसे पूरे राष्ट्र की आश्वयकता बतलाया। इसे पूर्वकालीन शिक्षा सम्बन्धित विभिन्ताओं और त्रुटियों को दूर करने वाली भी बतलाया था। इसे ही नयी शिक्षा-नीति की संज्ञा दी गई थी। इस शिक्षा-नीति की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

1.     जीवन शिक्षा की एकरूपता- इस नयी शिक्षा-नीति को जीवन पर आधारित बनाया गया था। इसे जीवनानुकूल होने पर बल दिया गया। इसके लिए प्रधानमंत्री ने एक विशेष मन्त्रालय बनाया। उसका नाम ‘मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय’ रखा गया। इससे शिक्षा को मानव जीवन के विभिन्न अंगों से जोड़ने के साथ ही साथ इसके विकास से विभिन्न संसाधनों अर्थात् सरकारी, अर्ध-सरकारी और गैर- सरकारी सहायता स्रोतों की उपलब्धि भी सुलभ हो गई। इसमें साहित्य-संस्कृति और भाषा विकास आदि के प्रवेश से शिक्षा का क्षेत्र बहुत फैल गया।

2.     एकरूपता- इस शिक्षा-नीति के द्वारा पूरे देश में एक ही ढंग की शिक्षा, अर्थात् सभी विद्यालयों में 10+2 कक्षा तक तथा सभी महाविद्यालयों में एक सा तीन वर्षीय उपाधि पाठ्यक्रम लागू कर दिया गया।

3.     बुनियादी स्तर पर परिवर्तन- नयी शिक्षा-नीति के द्वारा हमारी बुनियादी शिक्षा में परिवर्तन हुआ। इसके अनुसार प्रत्येक गाँव में अनिवार्य रूप से एक एक विद्यालय खोले गए। इनमें सभी वर्ग के विद्यार्थियों की पढ़ाई आदि की अपेक्षित सुविधा का ध्यान रखा गया। पिछड़े वर्ग के व्यक्तियों को विशेष सुविधा प्रदान की गई। इसके द्वारा प्रोढ़ शिक्षा का अधिक प्रचार और प्रसार हुआ।

4.     आधुनिक संसाधनों का विशेष प्रयोग- नयी शिक्षा-नीति के प्रचार और प्रसार के लिए आकाशवाणी, दूरदर्शन, कम्प्यूटर इत्यादि नये और उपयुक्त साधनों का प्रयोग व्यापक स्तर पर किया गया। इससे पहले आकाशवाणी और दूरदर्शन के प्रसार प्रचार कार्य जो सीमित थे, उसे अब व्यापक स्तर प्रदान करते हुए सभी आकाशवाणी और दूरदर्शन के केन्द्रों से एक समान ही शैक्षिक कार्यक्रम प्रसारित करने पर विशेष जोर दिया गया। इससे अब शिक्षा विद्यालयों और महाविद्यालयों, विश्वविद्यालय के प्रांगण तक ही सीमित नहीं रही अपितु वह समाज और राष्ट्र के घट घट से उच्चरित होने लगी।

5.     केन्द्रीय विद्यालयों को प्रोत्साहन- नयी शिक्षा-नीति ने सभी केन्द्रीय विद्यालयों को एक ही तरह की सुविधाएँ दे दी हैं। इस नीति ने देश के हरेक जिले में कम से कम केन्द्रीय विद्यालय की व्यवस्था बना ली है। इससे अधिकांश जिलों में ये विद्यालय खुल चुके हैं। शेष स्थानों पर केन्द्रीय विद्यालयों की योजना बनी हुई है।

6.     प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की खोज- नयी शिक्षा-नीति के द्वारा प्रतिभाशाली विद्यार्थियों और योग्य शिक्षार्थियों के लिए जिलास्तर पर ‘नवोदय विद्यालयों’ को स्थापित करने की योजना बना दी गई है। इन विद्यालयों में विशेष स्तर की शिक्षा देने की व्यवस्था है।

7.     परीक्षा-पद्धति में परिवर्तन- नयी शिक्षा-नीति में परीक्षा की विधि एवं पूर्व परीक्षा विधि की तरह परीक्षा भवन में बैठ बैठकर रटे रटाए प्रश्नोत्तर लिखने तक सीमित नहीं रह गई है, अपितु विद्यार्थियों के व्यावहारिक अनुभव को भी परीक्षा का आधार बनाया गया है। इसमें प्रत्याशी अपने व्यावहारिक स्तर के मूल्यांकन के आधार पर कोई पद, व्यवसाय या उच्चतम अध्ययन को चुनने के लिए बाध्य होगा।

इस प्रकार से हमारी नयी शिक्षा-नीति हर प्रकार से अपेक्षित और उपयोगी शिक्षा-नीति होगी और यह सभी प्रकार की अटकलों और भटकनों को दूर करने में समर्थ होगी।

(700 शब्द words)

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